समीक्षा

"परिंदों को मिलेंगीं मंज़िलें एक दिन, यह फैले हुए उनके पर बोलते हैं, वही लोग खामोश रहते हैं अक्सर, ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं."

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Ayush Kumar Dwivedi


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बहुओं का आयात

Posted On: 23 Feb, 2013  
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के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

sarswat जी, नमस्कार कविता में लिखी बात आने वाले समय में बहुओं का अपनी सास के ऊपर होने वाले रुतबे को दर्शाती है. लड़कियों की घटती संख्या इस बात की ओर इशारा कर रही है की निकटतम भविष्य में किसी माँ के लिए अपने बेटे की शादी कर सास बनाना किसी जंग जीतने से कम नहीं होगा. ऐसे में बहुओं का रुतबा बड़ना लाज़मी है. आज गृह कलह की दशा में बहुओं को जलते कुछ परिवारों में आसानी से देखा जा सकता है. ऐसे में आने वाले समय में जहाँ सास और बहू में रुतबे और लाचारी को लेकर अदला-बदली होना निश्चित है, तो उसी परिवार में बहु की जगह सास के जलने की बात की तो क्या गलत किया. बाकी आप की सोच पर निर्भर करता है. अपने विचार किसी पर थोपना मेरा उद्येश्य नहीं है....

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